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दोपहर की घरेलू धुन
सिलाई मशीन के पास बजता रेडियो.
कुछ दोपहरें काम की रफ़्तार से नहीं, पास बजती धुन से याद रहती हैं.
काम के बीच की आवाज़
सिलाई मशीन का पहिया घूमता है, कपड़े की तह सीधी की जाती है और पास रखा रेडियो कमरे को एक अलग लय देता है. गीत सुनने के लिए काम रोकना ज़रूरी नहीं होता. कभी धुन साथ चलती है, कभी अगली पंक्ति से पहले हाथ अपने आप धीमे हो जाते हैं. ऐसी दोपहरें किसी एक घर की कहानी नहीं; रोज़मर्रा को थोड़ा ध्यान से सुनने का एक तरीका हैं.
चाय का छोटा विराम
बटन, धागा और कैंची अपनी जगह रहते हैं. चाय का कप आते ही मेज़ पर थोड़ी जगह बनती है. रेडियो पर कोई पुराना गीत हो तो हर काम पूरा करना उस पल की शर्त नहीं रह जाता. पाँच मिनट बैठना भी एक काम है: अपने दिन में अपनी मौजूदगी महसूस करना.
आज की सुनने की रस्म
आज कोई छोटा घरेलू काम चुनिए. उसे शुरू करने से पहले “Aap Ki Nazron Ne Samjha” चलाइए और बीच में एक बार रुककर सिर्फ़ धुन सुनिए. किसी याद को ज़बरदस्ती बुलाने की ज़रूरत नहीं. जो याद आए, उसे थोड़ी देर बैठने दीजिए.