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पुराने नाम लिखने की जगह
फोन के पास रखी गीत की पर्ची.
कभी किसी की बताई धुन को याद रखने के लिए एक काग़ज़ काफ़ी था.
नाम कहीं खो न जाए
घर के फ़ोन के पास रखी छोटी पर्चियाँ सिर्फ़ नंबरों के लिए नहीं होती थीं. कभी किसी दोस्त की सुझाई धुन का नाम भी वहीं उतर आता था. बात ख़त्म होने के बाद वह काग़ज़ किताब में, मेज़ पर या जेब में रह जाता. गीत उस वक़्त हाथ में नहीं होता था, फिर भी उसे सुनने का इरादा बचा रहता था.
सुनने से पहले का इंतज़ार
आज नाम लिखते ही गीत मिल सकता है. तब अक्सर उसे खोजने में थोड़ा वक़्त लगता था. इस इंतज़ार में सुझाने वाले का चेहरा, उसकी आवाज़ और बातचीत का आख़िरी पल भी जुड़ जाते. कभी गीत हमारी पसंद बनता, कभी नहीं. लेकिन किसी ने उसे हमारे लिए चुना था—यह बात अलग से याद रह सकती है.
आज की छोटी रस्म
किसी अपने को एक गीत सुझाइए. सिर्फ़ लिंक भेजने के बजाय उसका नाम और उसे चुनने की एक छोटी वजह लिखिए. फिर उनसे पूछिए कि सुनकर क्या महसूस हुआ. जवाब का आपके जैसा होना ज़रूरी नहीं. संगीत पर बातचीत, संगीत के बाद भी चल सकती है.