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एक तारीख़, एक धुन
कैलेंडर का मुड़ा हुआ कोना.
दीवार पर टँगा कैलेंडर बड़ी योजनाओं के साथ छोटी बातों को भी जगह देता था.
दिन को दिखती हुई जगह
काग़ज़ का कैलेंडर हर सुबह वही रहता, पर उसकी तारीख़ बदल जाती. किसी दिन पेंसिल से एक घेरा बनता; किसी पन्ने का कोना मोड़ दिया जाता. उस निशान का मतलब केवल लिखने वाला जानता था. घर की दीवार पर समय इस तरह दिखाई देता था—बिना किसी सूचना की आवाज़ के.
छोटी बातों के लिए भी तारीख़
हर निशान छुट्टी या बड़े समारोह का नहीं होता. कभी चाय पर मिलने की बात, कभी कोई गीत फिर से सुनने की इच्छा भी दिन को याद रखने की वजह बन सकती है. पुराने कैलेंडर का आकर्षण शायद इसी सादगी में है: उस पर लिखा हुआ दिन अपने आप में बड़ा नहीं बनता, पर वह हमारी रोज़मर्रा की बातों को मिटने से थोड़ी देर रोक लेता है.
आज की सुनने की रस्म
आज के कैलेंडर में एक छोटा-सा समय अपने लिए तय कीजिए और “Kuch To Hua Hai” पूरा सुनिए. इस गीत के साथ किसी याद को साबित करने की ज़रूरत नहीं. बस ध्यान दीजिए कि किसी साधारण दिन के बीच कौन-सी हल्की-सी बात आपको मुस्कुराने देती है. चाहें तो उस दिन के पास एक छोटा निशान लगा दीजिए.